हरिवंश राय बच्चन के लिए एक श्रद्धांजलि

Tribute to Harivanshrai Bachchan

जीवन क्रम

हरिवंशराय बच्चन का जन्म इलाहाबाद के नजदीक प्रतापगढ़ जिले के एक छोटे से अमोढ़ गांव में हुआ था। उन्होंने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी साहित्य पढ़ाया। साल 1955 में कैम्ब्रिज से वापस आने के बाद वे भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में हिन्दी विशेषज्ञ के रूप में नियुक्त हुए। बच्चन को 1976 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। हरिवंश राय बच्चन का 18 जनवरी, 2003 को मुंबई में देहांत हो गया।

प्रमुख कृतियां

उनकी कृति दो चट्टाने को 1968 में हिन्दी कविता का साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मनित किया गया था। इसी वर्ष उन्हें सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार तथा एफ्रो एशियाई सम्मेलन के कमल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। बिड़ला फाउण्डेशन ने उनकी आत्मकथा के लिये उन्हें सरस्वती सम्मान दिया था। बच्चन को भारत सरकार द्वारा 1976 में साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।

कृतियां से नव युवाओं को प्रेरणा

आज हिंदी के जाने-माने कवि और बॉलीवुड स्टार हरिवंश राय बच्चन का जन्मदिन है।इस मौके पर उनके द्वारा लिखी गई मधुशाला की कुछ ऐसी पक्तियां बताने जा रहे हैं, जो आज बन रहे माहौल पर सटीक बैठती हैं और युवाओं की सीख भी देती हैं।

देखिए कविता मधुशाला का संक्षिप्त और आज वर्तमान के साथ उनकी समानता।

सांप्रदायिकता परमधुशाला

मुसलमान और हिन्दू हैं दो, एक मगर उनका प्याला।

एक मगर उनका मदिरालय, एक मगर उनकी हाला।

दोनों रहते एक न जब तक, मंदिर-मस्जिद में जाते।

मंदिर-मस्जिद बैर कराते, मेल कराती मधुशाला।

धार्मिक उन्मांद परमधुशाला

धर्मग्रंथ सब जला चुकी है, जिसके अंतर की ज्वाला,।

मंदिर, मस्जिद, गिरजे सबको तोड़ चुका जो मतवाला।

पंडित, मोमिन, पादरियों के फंदों को जो काट चुका।

कर सकती है आज उसी का स्वागत मेरी मधुशाला।

भटके या गुमराह होने वालों परमधुशाला

मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवाला।

किस पथ से जाऊं, असमंजस में है भोला-भाला।

अलग-अलग पथ बतलाते सब, पर मैं यह बतलाता हूं।

राह पकड़ तू एक चला चल,पा जाएगा मधुशाला।

सर्वधर्म समभाव को मधुशाला

एक बरस में एक बार ही जलती होली की ज्वाला।

एक बार ही लगती बाजी, जलते दीपों की माला।

दुनियावालों किंतु किसी दिन, आ मदिरालय में देखो।

दिन में होली रात दिवाली, रोज मनाती मधुशाला।


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