Beautiful Dialogues of Hindi Movie ‘My Father Iqbal’

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ना चाहा था जन्नत बन जाये जहन्नुम, ना मांगी थी दुआ किसी के मारने की! अब मांगूं क्या उस रब से दुआ अब तो उसने भी शुरुआत कर डाली खता करने की!

तरकीब दी भी तो क्या खूब दी बस तेरे आगोश मैं आने की!

और साजिद के बारे में क्या सोचा है?

इतनी महंगाई है! मेरी आंगनवाड़ी से कुछ भी नहीं मिलता! मैं समझ रहा हूँ! लेकिन मुझे सिर्फ आपका साथ चाहिए!

हिन्दू हो चाहे मुस्लिम हम सब मजहब के नाम पर बटना नहीं चाहते!

ठीक है अगर मुझ पर भरोसा है तो इस बार अपना वोट प्रेमचंद को दो!

इस इश्क़ के दरिया से केहदो सरेआम बहे, इस आशिक़ ने तैरना सीख लिया है!

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